वृद्ध नहीं वटवृक्ष है वो
क्यूँ वृद्ध आश्रम के कक्ष है वो
हम जिनकी छाया तले पले
दिल से हमारे समक्ष है वो
बोझ नहीं सुरक्षा चक्र है वो
हर परिवार का फख्र है वो
स्वाभिमान हमें सिखाया जिसने
हम भुजा तो शरीर में वक्ष है वो
अच्छे बुरे का भान है उनको
इस दुनियाँ का ज्ञान है उनको
सीखो अभी उम्र है सारी बाकी
जीवन की हर विधा में दक्ष है वो
गुलाम जो वृद्धों का सम्मान नही होगा
तो क्या संस्कृति का विनाश नहीं होगा
जब पहुँचेगा दरगाह में रब्ब की
हर फैसले में तेरे पक्ष है वो: गुलाम

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