मंगलवार, 3 सितंबर 2024

तलाश

तेरे नाम में अक्सर मैं अपना नाम ढूंढ़ता हूँ 

हवाओं की सरसराहट में तेरा पैगाम ढूंढ़ता हूँ 

दुनियाँ ढूंढती है खुदा को मुझे क्या मतलब 

मैं तो बस अपने यार को सुबह शाम ढूंढ़ता हूँ 


और जो पता दिया है किसी उजाले ने तेरा 

अँधेरे में उसको रात भर तमाम ढूंढ़ता हूँ

कर बैठा हूँ गुनाह कर के मोहब्बत मैं यारों

लग जाए कोई मुझ पर भी इलज़ाम ढूंढ़ता हूँ 


इब्लीस भी करता मोहब्बत तो खुदा हो जाता 

नफरतों से क्या होगा उसका अंजाम ढूंढ़ता हूँ 

शराब के प्यालों से जो वफ़ा मिल जाती शायद 

फिर क्यूँ वही पैमाना मैं हर शाम ढूंढ़ता हूँ 


यूँ तो दिखाया था आईना कई बार ज़माने ने 

अपनी सूरत को तेरी नज़रों में हर बार ढूंढ़ता हूँ 

उजड़े हुए बाग का माली हो गया हूँ तो क्या 

कभी तो उसकी रहमत से होगा गुलज़ार ढूंढ़ता हूँ 


ग़ुलाम' को तो इन दिलासों ने ज़िंदा रखा है हुज़ूर 

कैसे गुज़री है उम्र मुश्किल में उसकी तमाम ढूंढ़ता हूँ 

इसी उम्मीद में चल रही है साँसे मेरी अब तलक

के वो खुद चल के आएगा जिसे सरेआम ढूंढ़ता  हूँ 


हरविंदर सिंह 'ग़ुलाम' 

पटियाला, पंजाब 

स्वरचित 



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