मंगलवार, 10 मई 2022

मिसाल

मुस्कुरा कर देखते है नज़रें भी चुराते है 

टालमटोल करते रहे मेरे हर सवाल पर 

समझ न आयी उनकी दिल्लगी अब तलक 

रहम क्यों न आया उन्हें दीवाने के हाल पर 


क़त्ल हो कर भी उसे क़ातिल न कह सके 

खामोश हुए लब उनकी आँखों के बवाल पर 

पहले तो गिराई थी उसने ज़ुल्फ़ों की घटा 

बिजलियाँ फिर कई चमकी उनकी मिसाल पर 


बुत बन गया था मैं करता भी तो क्या करता 

हैरान रह गया था उसके तिलस्म कमाल पर 

फिर हिम्मत रही न इतनी भी कोशिश कोई करूँ 

भरोसा सा बंध गया था उसके फेंके जाल पर 



'ग़ुलाम' को तो मोहब्बत ने मारा तो मरा 

वरना उसे भी नाज़ था तीर ओ कमान पर 

आज उसपर भी फ़रिश्ते यूँ ही हँसा करते है 

जैसे शैतान हँसता है इन्सां के हाल पर 


हरविंदर सिंह 'ग़ुलाम' 

पटियाला, पंजाब 

स्वरचित 


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